NPA Kya Hai | NPA Full Form | Full Detail

साथियों अक्सर आप एक शब्द बार-बार सुनते होंगे कि इस बैंक ने इस व्यक्ति को NPA की श्रेणी में डाल दिया है तो आज के इस पोस्ट में हम जानेंगे कि NPA क्या होता है? और NPA की Full Form क्या होती है। बैंक कब NPA घोषित करता है इन सभी सवालों के जवाब आपको आज के इस पोस्ट में मिलने वाले है।

NPA क्या है?

जब बैंक किसी व्यक्ति को लोन देती है तो कई बार लोन लेने वाला व्यक्ति बैंक को उस धन का ब्याज देना बंद कर दे तो ऐसी स्थिति में बैंक उसे NPA घोषित कर देती है।

NPA की Full Form :

NON PERFORMING ASSET { गैर निष्पादित संपत्ति } है।


उदाहरण:

अब हम NPA की प्रकिया को उदाहरण के माध्यम से समझते है माना की कोई व्यक्ति जेम्स को कोई बिजनेस प्रारंभ करना है उसके लिए उसको पैसे चाहिए तो वो सीधा बैंक के पास जाएगा बैंक उसको पैसा तो दे देगा मगर उसके बदले उसकी प्राॅपर्टी, व ज्वैलरी या अन्य कोई किमती सामान अपने पास गिरवी रख लेगा और उसको पैसे दे देगा। बैंक द्वारा उस पैसे का ब्याज भी लिया जाएगा ब्याज के लिए बैंक किश्त निर्धारित कर देगा कि आपको इतने-इतने महीने बाद इतनी-इतनी किश्त जमा करानी है।
जब जेम्स वो किश्त जमा कराने मे नाकाम रहता है या जमा कराना नहीं चाहता है तो ऐसी स्थिति में उसे बैंक द्वारा प्रत्येक महीने नोटिस भेजा जाता है अगर तीन महीने बाद भी वह जमा नहीं करा पाता है तो उसके बाद बैंक द्वारा लीगल एक्शन लिया जाता है और उसे NPA की कैटगरी में डाल दिया जाता है।
आपको जानकार हैरानी होगी बैंक ने अभी तक 1 लाख 50 हजार करोड़ रूपए को एनपीए की कैटगरी में डाल दिया है अब यह बैंक ने भी मान लिया है कि यह पैसा अब बैंक को वापस मिलने की संभावना नगण्य सी रह गई है।


सरकार के कदम:

जब 90 के दशक से पहले कई बार ऐसा भी होता रहा है कि लोग बैंक का पैसा खाकर उसे वापस नहीं देते यहां तक की ब्याज भी नही जमा कराते थे अब तो ऐसा कम होता है इसके लिए सरकार ने कई कानून बना दिए है। इस डूबे हुए पैसे को बैंक BAD Loan के नाम से पुकारती है इसको निकालने के लिए या बैंको को मजबूती प्रदान करने के लिए भारत सरकार ने 1993 में DRT [ Debt Recovery Tribunals ] के नाम से एक सरकारी संस्था की स्थापना की जिसके जरिए बैंको को डूबे हुए पैसे निकालने के लिए कुछ अधिकार प्रदान किए गए।
1993 से पहले क्या होता था कि कोई बैंक का पैसा खाकर सीधा कोर्ट का रूख कर लेता और बैंक पर ही उल्टे आरोप गढ़ देता और कह देता कि झूठा प्रलोभन देकर उसे बैंक ने ठग लिया और अब वापस पैसे मांगे जा रहे उस बैंक डिफाॅल्टर का मैन मकसद होता कि कैसे भी करके इस मामले को बैंक में लंबित कर दिया जाए और आगे चलकर रफा-दफा कर दिया जाए।
सरकार ने उपरोक्त स्थिति पर लगाम लगाने के लिए Debt Recovery Tribunals की स्थापना की जिसका प्रमुख उद्देश्य है कि कोई भी बैंक डिफाॅल्टर न्यायालय में बैंक से जुड़ी कोई भी अपील नही कर सकता है अगर वह करता है तो उसकी अपील को अमान्य घोषित कर दिया जाएगा इसके लिए उसको Debt Recovery Tribunals में दावा दर्ज करवाना होगा।
मगर आगे चलकर DRT में इतने दावे दर्ज हो गए कि यह संस्था भी असफल हो गई आज की तारीख में DRT के अंदर 75 हजार से अधिक दावे अभी Pending में पड़े है DRT की असफलता के बाद भारत सरकार ने साल 2002 में SARFAESI ACT बनाया जिसका प्रमुख उद्देश्य है DRT की कमजोरीयों को दुरस्त करना और बैंको को मजबूत बनाना।

SARFAESI ACT की Full Form :

Securitisation And Reconstruction Of Financial Assets and Enforcement Of Security Interest Act, 2002


DRT कानून के बाद बैंको को अनेक प्रकार कि मजबूती मिली है जैसे:
इस कानून के बनने के बाद बैंक वाले डिफाॅल्टर व्यक्ति की संपति को जब्त कर सकते है।
अगर डिफाॅल्टर अपनी संपति को किसी तीसरे Person को बेच देता है फिर भी बैंक को यह अधिकार दिया है कि वह सीधे तीसरे Person की भी संपति को अपने अधीन कर सकती है।
इस कानून के अधीन 10 लाख तक के लोन को भी रखा गया है।
आज की तारीख में भारत में लाखों ऐसे लोग है जो एनपीए के अधीन आते है और वे सारा पैसा आज डूबने की कगार में है। DRT कानून को भारत सरकार को और सख्त करने की आवश्यकता है। भारत सरकार को इस कानून में ऐसा नियम बना देने चाहिए कि कोई भी बैंक का पैसा नहीं खा पाए। आज की तारीख में भारत में विजय माल्या, नीरव मोदी, महुल चोकसी, सुब्रत राॅय जैसे अनेक बैंक डिफाॅल्टर है जो भारत में बैंको का पैसा खाकर विदेश भाग गए है उन सभी को भारत लाकर कड़ी से कड़ी सजा देनी चाहिए। और DRT के तहत उस पैसे को वसूल करना चाहिए।
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